दूसरे गांव में एक साधु की चर्चा हो रही थी। सुनने में आया था कि वह चेहरा देखकर भविष्य बता रहा है। कई लोगों को उसने यह तक बता दिया कि उनकी मृत्यु कब होगी। बड़ी संख्या में लोग उसके अनुयायी हो गये। मुझे किसी ने बताया कि वह हमारे गांव कल आयेगा। मुझे उत्सुकता थी कि मैं साधु बाबा से अपना भविष्य जानूंगा।रात भर मेरे मस्तिष्क में सैकड़ों प्रश्न मंडराते रहे। सबसे पहले क्या पूछूंगा? मैं बड़ा होकर क्या बनूंगा? मेरी दादी और कितने दिन जियेगी?
आखिरकार सुबह हो गयी। रघु एक पतंग लाया था।
मैंने कहा,‘‘आज साधु बाबा आ रहे हैं, जो किसी का भी भविष्य केवल चेहरा देख कर बताते हैं। पतंग कल उड़ा लेंगे।’’
रघु ने कहा,‘‘मुझे मालूम है। मां ने बताया था। अभी थोड़े ही साधु आ रहा है। इतने हम तालाब किनारे पतंग उड़ाने चलते हैं।’’
मैं उसके साथ हो लिया। उस समय तालाब के किनारे घाट खाली था। मंद-मंद हवा चल रही थी। हम एक किनारे खड़े होकर पतंग उड़ाने लगे। तभी मेरी नजर एक साधु पर पड़ी जो तालाब के दूसरे किनारे पर खड़ा था। मुझे समझते देर न लगी।
मैंने रघु से कहा,‘‘लगता है यही साधु बाबा हैं। उनके पास चलते हैं।’’
हम दौड़कर उसके समीप पहुंचे। साधु स्नान करने के लिए कपड़े उतार रहा था। हमें देखकर उसने झट से कपड़े पहन लिए।
‘‘क्या बात है बच्चा?’’ साधु बोला।
‘‘हम आपके बारे में काफी सुन चुके हैं बाबा। पास के गांव से आये हैं आप।’’ मैं हाथ जोड़कर बोला।
‘‘हां बेटा, पर तुम यह क्यों पूछ रहे हो?’’ साधु ने कहा।
‘‘अपना भविष्य जानना चाहता हूं बाबा।’’ मैं बोला।
‘‘पहले मैं स्नान कर लूं। उसके बाद दोनों का भविष्य ही नहीं, भूत भी बता दूंगा।’’ साधु ने अपने कपड़े उतारे और तालाब में ‘ऊं नम: शिवाय! ऊं नम: शिवाय!’ का जाप करता उतर गया।
उसने हमसे कहा कि हम उसके कपड़ों और पोटली का ख्याल रखें। साधु को डर था कि कहीं कोई उसका सामान न ले जाए। साधु ने नाक बंद कर मंत्र का जाप किया और डुबकी लगायी।
साधु ने फिर कहा ‘जय श्रीराम!’ और डुबकी लगा दी। रघु ने फुर्ती से साधु के कपड़े अपनी कमीज में छिपा लिए और पोटली पास की झाड़ियों में फेंक दी। साधु डुबकी लगाने में इतना मशगूल था कि उसे एहसास तक न हो सका कि तालाब के बाहर क्या घट रहा है। रघु ने मेरा हाथ पकड़कर खींचा और हम झाड़ियों के पीछे जा छिपे।
स्नान के बाद साधु बाहर आया। उसने अपने कपड़ों को इधर-उधर देखा। वह बेचैन हो उठा। हम सारा नजारा देख रहे थे और रघु खिलखिला रहा था।
‘‘साधु हमें मन ही मन गालियां दे रहा होगा।’’ रघु ने धीमी आवाज में मुझसे कहा।
‘‘हमने शायद गलत किया बाबा के साथ।’’ मैं बोला।
‘‘तुम देखते जाओ, मैं क्या करता हूं? बस, बीच में टोकना मत।’’ रघु ने आंखें बड़ी करते हुए कहा।
मुझे रघु पर विश्वास था, इसलिए मैं उसके साथ छिपा रहा। बुदबुदाता साधु गांव की तरफ बढ़ चला। उसके शरीर का सारा पानी क्रोध की ऊष्मा से उड़ा चुका था, सिर्फ लंगोट में नमी शेष थी।
हम उससे निश्चित दूरी बनाए थे। उसके गांव में प्रवेश करते ही कुत्तों ने उसपर भौंकना शुरु कर दिया। साधु डर गया। उसने एक लकड़ी उठा ली और उन्हें ‘हट! हट!’ कहकर दूर जाने को कहने लगा। कुत्ते कहां मानने वाले थे, वे लगातार भौंक रहे थे। किसी अद्र्धनिवस्त्र साधु को वह पहली बार देख रहे थे, इसलिए उनका भौंकना स्वभाविक था।
तभी एक बलवान कुत्ते ने लकड़ी को साधु से छीनकर अपने मुंह में भर लिया। साधु के हाथ-पैर फूल गए। वह जमीन पर गिर गया। बलवान कुत्ता गुर्राया।
कुत्तों ने साधु के चारों ओर घेरा बना लिया और धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगे। साधु ‘हरे राम! हरे राम!’ का जाप करने लगा। वह अपने में सिकुड़ता जा रहा था। एक कुत्ते ने झट से उसकी लंगोट का छोर मुंह में भर लिया और उसे खींचने लगा। कुत्ता उसे खींचने की कोशिश कर रहा था, तो साधु लंगोट को कसके पकड़े था। टांगे उसने सिकोड़ कर सीने से सटा रखी थीं। थोड़ी देर में वह कुत्तों के सामने गिड़गिड़ाकर इज्जत की भीख मांगने लगा। तभी कुछ ग्रामीण वहां आकर एकत्रित हो गए। उन्हें देख कुत्तों का समूह वहां से खिसक गया।
साधु ग्रामीणों के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला,‘‘भाईयो, आपने मेरी जान बचाई। आपका बहुत धन्यवाद।’’
एक ग्रामीण बोला,‘‘पर आप हैं कौन? यह हालत आपकी कैसे हुई?’’
पेड़ के पीछे छिपा रघु सामने आ गया। वह बोला,‘‘मैं बताता हूं, ये महाशय कौन हैं?’’
साधु हमें देखते ही आगबबूला हो गया।
वह कुछ बोल पाता कि उससे पहले ही रघु ने बताना शुरु किया।
‘‘ये साधु महाराज हैं जो सबका भूत और भविष्य बताते हैं और वह भी चेहरा देखकर।’’ रघु की ओर ग्रामीण हैरानी से देखते रहे।
उसने आगे कहा,‘‘.....लेकिन साधु महाराज को इतना पता नहीं कि उनके साथ कुछ मिनटों में क्या होने वाला है? उन्होंने हम दोनों का भी तो चेहरा देखा था।’’
इतने में वहां काफी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। बेचारा साधु अभी तक हाथ जोड़े खड़ा था। उसके मुख से एक शब्द न निकला। गांववालों को समझते देर न लगी। उधर रघु ने साधु को उसके कपड़े और पोटली दे दी। साधु तुरंत वहां से भाग खड़ा हुआ।
रघु की सभी ने तारीफ की, लेकिन साथ ही कहा कि वह आगे से इस तरह का बर्ताव किसी के साथ न करे।
घर पहुंचकर रघु ने किताब निकाली और उसे पढ़ने बैठ गया।
मैंने उससे कहा,‘‘छुट्टियां खत्म होने जा रही हैं। मैं भी यहां से जाने वाला हूं। तुम दुखी तो नहीं होगे।’’
‘‘हर साल की तरह अगले साल का इंतजार करुंगा।’’ वह बोला।
‘‘तुम शरारती हो, पर अच्छे हो।’’
‘‘वाकई।’’
‘‘हां।’’ मैंने कहा।
-Harminder Singh
-अगले अंक में पढ़िये: रेलगाड़ी का सफर
सारगर्भित कहानी... जो बहुत कुछ सिखाती है ... यदि आपको समय मिले तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है .... http://mhare-anubhav.blogspot.com/
जवाब देंहटाएंबढ़ीया कहानी !
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