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शुक्रवार, मई 11, 2012

अंशु का पपी

अंशु के पिल्ले की हालत देखकर मुझे ‘पलीत’ की याद आ गयी.
कल आशु के भाई को पपी के साथ खेलते हुए पाया। मैं बड़ा हैरान था। पिल्ले के गले में कई मीटर लंबी रस्सी जो प्लास्टिक की लगती थी बंधी थी। उसे आशु का भाई अंशु पट्टा कह रहा था। बेचारा पिल्ला चलना नहीं चाह रहा था लेकिन अंशु उसे घसीटता हुआ चल रहा था। गनीमत थी कि पिल्ला शोर नहीं कर रहा था। वैसे जब दोनों भाई और उनकी इकलौती बहन स्कूल चले जाते हैं तो अक्सर पिल्ला अलग-अलग प्रकार की आवाजें निकालता है। वह रोता रहता है या चिल्लाता रहता है।

सुना है अंशु की मम्मी को कुत्तों से उतना प्यार नहीं। तभी वे उन्हें हेट करती हैं। मेरी मां को भी लगता है कि कुत्ते-बिल्ली जैसे जानवर पाले नहीं जाने चाहिएं। खैर, सबका मत अलग-अलग है। हमारे यहां एक गाय और उसकी दो बेटियां आराम से रह रही हैं।

याद आया ‘पलीत’

अंशु के पिल्ले की हालत देखकर मुझे ‘पलीत’ की याद आ गयी। वर्षों पहले हमें एक अनाथ पिल्ला मिला। उस दिन वह कीचड़ में सना था। हमारा दिल पसीज गया। हमने उसे नहलाया और एक कपड़े से अच्छी तरह सुखा दिया। वह बड़ा खुश दिखा। पड़ोस के कई बच्चे हमारे इस कार्यक्रम में शामिल हो गये। अब पिल्ले की मौज आ गयी। दूध, रोटी, बिस्किट जैसी चीजें उसे दी जाने लगीं।

उसकी एक बात बड़ी ही खराब थी। नहाने के कुछ समय बाद वह कीचड़ में खेलने लगता। घर के सामने एक जगह कुछ पानी भरा हुआ था। उसमें नहाना उसे पसंद था। हम उसे नहलाते, वह फिर वहीं पहुंच जाता। इस वजह से किसी ने उसे ‘पलीत’ कह दिया। फिर क्या था उसका नाम पक गया।

रही बात गले में रस्सी या पट्टा डालने की तो वह हम कर नहीं सकते थे क्योंकि हम आजादी का मतलब जानते थे।

एक दिन ‘पलीत’ किसी पर भौंक रहा था। वह एक पागल भिखारी जैसा इंसान दिखता था। फिर ‘पलीत’ की आवाज नहीं आयी। उस पागल व्यक्ति ने पिल्ले के गले को अपने पैर से दबा दिया और वहां से भाग गया। हमें बाद में यह पता चला। कई दिन तक उसका इलाज किया गया, लेकिन वह चल बसा।

yours


harminder



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