मेरे आसपास जब ढेर सारे बच्चे होते हैं तो मजाक शुरु हो जाता है। सबकी कहानी अलग होती है। कोइ बहादुरी के किस्से इस मासूमियत और गंभीरता के साथ बयान करता है कि हम उसे सच मानने लग जाते हैं।
माहौल एकदम शांत -ठीक वही सन्नाटा, तूफान आने से पहले वाला। फिर एक-दूसरे के चेहरों को देखकर जो हंसी छूटती है, वह रुकने का नाम नहीं लेती। एक-आध तो इस चक्कर में तालियां पीटनी शुरु कर देते हैं।
हाल ही में चर्चा चली कि एक बच्ची पढ़ नहीं पा रही। क्या उसे पढ़ाई के डाक्टर के पास ले जायें? पर कहां?
उफ! ये पढ़ाई भी न।
मैंने कहा -‘‘शिवानी का भाई विशू और आशु का छोटा भाई, काफी दिनों से रिसर्च में जुटे हैं। वे एक ऐसा फार्मूला बनाने की कोशिश में हैं, जिसके एक डोज से कुछ भी याद हो सकता है। सिंपल : किताब के पन्ने फाड़ो, सोल्यूशन में घोलो और पीलो! खेल खत्म, पन्ने हजम।’’
सभी बच्चे आंखें फाड़कर मेरी ओर देख रहे थे। उन्हें थोड़ा-थोड़ा यकीन आ रहा था, कई को पूरा भी। पर शिवानी तो वहीं बैठी थी। यह सोचने वाली बात है।
भई, जब सभी तोप के गोले छोड़कर भले-मानुष बने थे, तो मैंने भी मुर्गाछाप की ट्राई मारी। कैसी रही?
Yours
Harminder
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