छुट्टियां अच्छी बीत रही थीं। तभी समाचार मिला कि मां और नेत्रा गांव आ रहे हैं। यह सुनकर मैं फूला नहीं समाया। अगली सुबह वे आने वाले थे।गांव के नजदीक रेलवे स्टेशन था- यही कोई आधा किलोमीटर की दूरी पर। प्लेटफार्म पर हम कभी-कभार खेलने निकल जाते। स्टेशन मास्टर दलीप सिंह गांव के ही थे। उन्हें वहां आवास मिला था। दलीप सिंह से मैंने दोस्ती कर ली थी। उम्र का फासला करीब बीस बरस का था, पर रघु और मैं उनसे ढेर सारी बातें करते।
रघु मेरे साथ रेलवे स्टेशन पहुंचा। रेलगाड़ी आने में आधा घंटा शेष था। रघु ने कहा कि इतने स्टेशन मास्टर से गप्पे हांक ली जाएं। दलीप सिंह उस वक्त कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे और चाय का प्याला मेज पर रखा था।
मैंने कहा,‘आप अखबार ही पढ़ते रहेंगे, चाय में मक्खी न गिर जाए।’ उन्होंने हमारी तरफ देखा और मुस्कराये।
तभी चाय में मक्खी गिर गयी।
रघु बोला,‘स्टेशन मास्टर साहब मक्खी गिर गई। मेरा दोस्त सही कह रहा था।’
इसपर दलीप सिंह ने कहा,‘कोई बात नहीं, जाओ तीन कप चाय को मनकू चायवाले से कह आओ।’
थोड़ी देर में मनकू तीन प्याला चाय ले आया।
‘चाय में शक्कर है ही नहीं।’ एक घूंट भरकर रघु ने मुंह सिकोड़ते हुए कहा। मैंने भी चाय चखी। चाय बिल्कुल फीकी थी।
तभी दलीप सिंह बोले,‘रघु उसे कह देते कि मैं अपने लिए तीन प्याला चाय नहीं मंगा रहा।’
‘क्या मतलब?’ रघु समझ नहीं सका।
‘मतलब यह कि मुझे डायबिटीज़ है। इसलिए शक्कर को मना किया हुआ है डाक्टर ने। समझे।’ दलीप सिंह ने रघु के सिर पर हल्का हाथ मारा।
रघु ने कहा,‘गांव में मोनू के चाचा को यही बीमारी है। लेकिन मोनू कहता है कि उसके चाचा चोरी छिपे मीठा खा लेते हैं। मैंने खुद उन्हें बलराम हलवाई की दुकान पर जलेबियां खाते देखा है। क्या पता स्टेशन मास्टर भी कभी-कभार मीठा चख लेते हों? मुझे पूरा मालूम नहीं था, बस अंदाजा लगा रहा था। वैसे अंदाजा लगाने में हर्ज ही क्या है?
‘चलो अब अपनी-अपनी चाय में मनकू से शक्कर डलवा लाओ।’ दलीप सिंह ने हमसे कहा।
हम मनकु चायवाले के पास पहुंचे ही थे कि रेलगाड़ी के हार्न की आवाज हमें सुनाई दी। चाय के प्यालों में शक्कर डलवाकर हम प्लेटफार्म पर खड़े हो चुस्की लेने लगे।
रेलगाड़ी आकर रुक गयी। एक-एक कर यात्री उतरने लगे। मां को हम तलाश कर रहे थे। काफी छानबीन के बाद उनका कहीं पता नहीं चला।
मैंने और रघु ने सभी डिब्बों की तलाशी ली लेकिन वे हमें नहीं मिलीं। हम दौड़कर स्टेशन मास्टर के पास पहुंचे।
मैंने उनसे कहा,‘मां इस गाड़ी में नहीं आयीं। क्या इसके बाद कोई गाड़ी यहां पहुंचेगी?’
‘अब छह घंटे बाद एक पैसेंजर यहां रुकेगी। शायद उस से तुम्हारी माताजी आयें।’ दलीप सिंह बोले।
रेलवे स्टेशन पर फोन बूथ से मैंने मां से बात की। मां ने बताया कि नेत्रा अचानक बीमार पड़ गयी। इस वजह से वह आ नहीं सके। इसलिए नेत्रा के स्वस्थ होने पर ही आ सकेंगी।
रघु का किसी बात को लेकर मनकू चायवाले से झगड़ा हो गया। वहां कई लोग जमा थे। स्टेशन मास्टर उसे समझाने पर तुले थे, पर वह मनकू से बहस किये जा रहा था। रघु की चाय में मक्खी गिर गयी थी। यह तब हुआ जब मैं बूथ में फोन कर रहा था। रघु जबसे तीन कप चाय पी चुका था। पैसे उसे थोड़े ही देने थे, स्टेशन मास्टर की उदारता का सारा असर जो था यह।
रघु ने कहा,‘चाय दोबारा बनाओ। पैसा नहीं मिलेगा।’
‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ मनकू बोला।
‘देखो सीधे-सीधे चाय बनाओ। गलती तुम्हारी थी।’
‘क्या मक्खी मैंने गिराई?’
‘यह मैं नहीं जानता। मुझे नया प्याला चाय चाहिए।’
‘मैं ऐसा नहीं कर सकता। जाओ यहां से। पैसा तो मुझे मिल जायेगा।’
‘चाय बनेगी और अभी बनेगी।’ रघु अड़ गया।
आसपास खड़े लोगों ने रघु को समझाया कि वह चाय तो घर जाकर भी पी लेगा, एक प्याले के लिए झगड़ा कैसा?
दलीप सिंह रघु का हाथ पकड़कर उसे अपने कक्ष में ले गये। वे बोले,‘छोटी-छोटी बातों पर लोगों के मुंह लगते हो। जितने प्याले चाहिए मैं यहीं मंगवा देता हूं। तुम्हें चाय पीने का बहुत शौक है, मुझे कभी बताया नहीं रघु।’ उनकी बातों में व्यंग्य छुपा था।
कुछ देर में रघु का गुस्सा शांत हो गया।
तभी शोर सुनकर दलीप सिंह बाहर दौड़े। हम भी उनके पीछे आ गये। देखा कि चार-पांच लड़के मनकू को पकड़कर पीट रहे थे। उनके हाथ में बेल्टे थीं। मनकू का चाय का ठेला उन्होंने पलट दिया था। वह जमीन पर पड़ा था। आसपास खड़े लोग उसे पिटता देख रहे थे, पर किसी में इतना साहस न था कि उसे बचा सकें। दलीप सिंह दहाड़ते हुए दौड़े,‘रुक जाओ।’ लड़कों ने जैसे ही उन्हें देखा, वे वहां से खिसक लिये।
इस घटना से रघु मन ही मन खुश हुआ। उसने मुझसे कहा,‘देख लिया न मुझसे बहस करने का नतीजा। अब कई दिन तक चाय नहीं बना सकेगा मनकू। अगर एक प्याला दोबारा चाय बना देता, तो उसका क्या खर्च हो जाता।’
‘यह क्या कहा रहा है रघु।’ मैंने कहा।
‘ठीक कह रहा हूं। एक मक्खी की कीमत चुकायी है उसने।’ वह बोला।
‘मक्खी की इतनी बड़ी कीमत।’ मैंने हैरानी से कहा।
‘हां।’ वह बोला।
‘वह किसी और वजह से पिटा है।’ मैंने कहा।
‘नहीं रे, मक्खी की वजह से।’ वह अपनी बात पर अड़ा था।
‘चल, जो तुम कहो, वही पत्थर की लकीर।’ मैं बोला।
सुबह दादी ने मुझे चाय बनाई। तभी रघु आ गया। उसे एक प्याला चाय दादी ने दी। साथ में प्लेट में नमकीन था। रघु ने चाय की चुस्की लेते हुए दादी से कहा,‘आपकी चाय का जबाव नहीं। और एक मेरी मां है कि चाय में पत्ती उबालती नहीं, फटाफट चाय तैयार। Åपर से दूध में कंजूसी करती है। अब आप ही बताओ, वह चाय होती है या मामूली उबला पानी.........ऊ....बू....बू....ऊ...ऊ...। मैं अपने घर की चाय मुशिकल ही पीता हूं।’
रघु ने बात पूरी ही की थी कि उसके प्याले में मक्खी गिर गयी।
वह झल्लाकर बोला,‘हो गया सत्यानाश। ये मक्खियां मेरा पीछा कब छोडेंगी। कल से यह हो रहा है।’
‘कोई नहीं बेटा, चाय जितनी चाहिए ले लेना। मैंने केतली में भर दी है। ला उडेल दूं।’ दादी मुस्करायी।
रघु चाय पीने लगा। वह फिर चीखा,‘इसमें भी मक्खी गिर गयी। मैं चाय ही नहीं पीता।’ इतना कहकर वह वहां से उठकर चला गया।
उसके जाने के बाद मैंने दादी को रेलवे स्टेशन का वाकया विस्तार से बताया। दादी की हंसी छूट पड़ी कि तब मेरे चाय के प्याले में मक्खी गिर गयी। फिर हम और जोर से हंसे।
-Harminder Singh
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