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सोमवार, जुलाई 11, 2011

किताब गयी कबाड़ में

















एक किताब की तलाश में मुझे काफी समय से थी। उसके लिए मैं कई लोगों के घर भी गया। उनमें ज्यादातर मेरे पड़ोसी ही थे। इसी चक्कर में शुभांगी के घर उसकी मम्मी के हाथों से बना भुने चने और मावे-बेसन का लड्डू भी खाना पड़ा। मावे से बनी मिठाईयों मैं थोड़ी बहुत ही पसंद करता हूं। हां, रसगुल्ला थोड़ा ज्यादा खा सकता हूं -यही कोई दो या तीन।

शुभांगी के घर मैं अकेला जा नहीं सकता था। ऐसा नहीं कि शाम के समय अंधेरा घिरने पर दुनिया का सबसे बड़ा डरपोक बन जाता हूं। बस मां के साथ जाना पड़ा। उनका कहना था कि इसी बहाने उनका घर भी देख लेंगी। मजेदार बात यह है कि शुभांगी के घर से चालीस-पचास कदम की दूरी पर ही हम रहते हैं।

खैर, किताब के विषय में ही सबसे पहले पूछा। पहले तो शुभांगी को ध्यान नहीं आया फिर उसने वंदना मौसी का जिक्र किया। वंदना जी को फोन मिलाया गया। उधर से जबाव आया -‘किस लिए चाहिए किताब?’ इधर से शुभांगी की मम्मी ने उत्तर दिया -‘पढ़ने के लिए।’ कुछ देर बाद मैंने शुभांगी से कहा -‘किताब में खजाने का राज छिपा है।’ इसपर हमें हंसी आ गयी।

पता चला कि किताब वंदना जी के पास हैं। मैं निश्चिंत हो गया। अनमोल और शुभी से मैंने स्कूल से लौटते समय उसे लाने को कहा क्योंकि वंदना जी उन्हीं के स्कूल में टीचर हैं।

दो-तीन दिन तक बच्चे यही कहते रहे कि वे आज उनसे कहना भूल गए। आखिरकार तीसरे दिन उन्होंने बड़े ही मासूम चेहरे के साथ कहा,‘किताब कबाड़ी को दी रद्दी के साथ चली गयी। बेचारी वंदना आंटी ने खूब खोजीं।’

मैं कुछ देर खामोश रहा फिर बोला,‘उनसे उस कबाड़ी का नंबर पूछ कर आना।’

चलिए, किताब तो गयी कबाड़ में। अब मुझे कुछ और इंतजाम करना होगा। वैसे उस किताब मैं मेरे पहले स्कूल के बारे में काफी कुछ जानकारी थी।

yours

Harminder Singh


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