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शनिवार, जुलाई 02, 2011

मिंकी का भगवान ही मालिक


दीपी के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। वह स्कूल खुलने से पहले काफी घबरा रही है। उसने होमवर्क लगभग निपटा दिया। मैथ्स में केवल तीन या चार एक्सरसाइज बची हैं। उसे लगता है वह स्कूल जाने से एक दिन पहले भी चैन से नहीं बैठेगी।

दीपी को अपनी एक साल पुरानी दोस्त मिंकी की भी चिंता है। उधर मिंकी बेफिक्र है। वह अपनी बुआ के यहां होलीडे के मजे में है। उसने होमवर्क ठीक से शुरु ही नहीं किया और होलीडे सिमट गये। ऐसे बच्चों के बारे में सोचकर मेरे जैसा इंसान खुद दुखी हो जाता है। वैसे मिंकी मेरे चाचा की लड़की है इसलिए टेंशन की बात कही जा सकती है। सातवीं क्लास की पढ़ाई उसे डराती है, पर वह डरकर प्रण करती है कि इसबार पहले से ज्यादा पढ़ेगी। मगर वही डाक के तीन पात -कुछ दिन का जोशा, बाद में बेहोश। भूल जाती है सारे प्रण -सबकुछ दफन इन द ग्रेव ताकि काफी दिनों तक सर न उठा सके।

अब मिंकी को समझाये कौन? दीपी खुद टेंशन में है। मम्मी कह भी दें तो सिर के ऊपर से गुजरता है। पापा बाहर रहते हैं। भाई-बहन की आजकल के बच्चे परवाह कितनी करते हैं। मुझे उतना वक्त नहीं।

लगता है मिंकी का भगवान ही मालिक है।

-Harminder Singh

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