Subscriber Box

रविवार, मार्च 06, 2011

SHUBHANGI तो बहाना है, शुभी को जो चिढ़ाना है





5 मार्च 2011

मुझे सपने में खुद को स्कूल जाना और टेंशन में रहता देखना अजीब लगता है। सुबह चार बजे के आसपास ही शायद मुझे सपने आते हैं क्योंकि उस समय मैं उठने की तैयारी करता हूं। आज सुबह भी मैं स्कूल में ड्रेस पहनकर जा रहा था। इतने समय बाद आप को कैसा महसूस होगा जब आप उस जगह फिर जायें जहां से आपका नाता दशक पहले था।

खैर, स्कूल से याद आया कि आज दसवीं का पहला पेपर था। mathematics मुझे कभी उतना भाया नहीं, लेकिन पता नहीं क्यों जब से मैंने shubhangi को मैथ्स पढ़ाना शुरु किया मुझे भी वह अच्छा लगने लगा, लेकिन उतना नहीं क्योंकि वह मेरे लिए उतना उपयोगी कहां। मैं ठहरा साहित्य वाला इंसान जिसे किताबें पढ़ने का शौक है और समय निकालकर कुछ लिख भी देता हूं।

तो मैं कहा रहा था कि सुबह कोहरा था। मौसम लगा कि खराब न हो जाये। पर ऐसा हुआ नहीं। आठ बजे के बाद जो धूप खिली, वह कमाल की थी। मुझे तसल्ली हुई। चलो shubhangi और sumit आराम से पेपर देकर आ जायेंगे। वैसे मानसी को कोई टेंशन ही बात नहीं थी क्योंकि उसे तो गजरौला के सेंट मैरी स्कूल में ही सेंटर पर पेपर जाना था।

मां ने बताया कि सुमित और rohit दोनों एक साथ amroha के लिए रवाना हुए हैं। मैंने कहा कि उनके पिताजी उनके साथ नहीं तो मां बोलीं कि बच्चे बड़े हो गये हैं, तुम्हारी तरह नहीं हैं कि जो दसवीं का पेपर अपने पिताजी को साथ लेकर देकर आओ। मां हंसीं और मुझे भी हंसी आ गयी।

शाम के समय सुमित मुझे पेपर दिखाने आया। उसने पेपर को मुंह में दबा रखा था क्योंकि वह ऐसा ही करता है। मैं कहा कि बेहतर किया होगा। तो वह बोला,‘‘बेहतर नहीं, बेहतरीन कहो। मुझे बेहतर समझ नहीं आता।’’

हम छत पर धूप में बैठ कर पेपर देखने लगे। उसने बताया कि अधिकतर प्रश्न एनसीआरटी से आये थे, सिर्फ अंक बदल दिये गये थे। उसी समय मैंने SHUBHANGI को अपनी दो सहेलियों के साथ जाते देखा। मैं उनके सिर ही देख पाया, बाकि मैंने अंदाजा लगाया कि उसकी सहेलियां ही साथ होंगी।






SHUBHANGI को आज मैंने सुपरमैन नया नाम दिया। यह सब मैंने शुभी को चिढ़ाने के मकसद से किया। शुभी ने बताया कि दीदी त्रिशा के पापा की वैन में पेपर देने गयी हैं। मैंने वही पुराने अंदाज में कहा कि क्या वह उसके ऊपर बैठ कर गयी है? Shubhi ने कहा,‘‘नहीं।’’ तो मैं बोला,‘‘ तो फिर नीचे लटक कर गयी होगी।’’ उसने फिर ‘न’ में उत्तर दिया। मैंने फिर कहा कि वह जरुर सुपरमैन बनकर गयी होगी। इतना कहते ही आकाश की हंसी छूट पड़ी।

बाद में मैंने कहा कि हमें हंसने का मौका कभी गंवाना नहीं चाहिए क्योंकि क्या पता यह पल हमें दोबारा कभी मिल पायें या नहीं। यह बात शुभी के समझ में आ गयी।

मैंने एक छोटा स्लोगन भी बनाया:

‘‘SHUBHANGI तो बहाना है,

शुभी को जो चिढ़ाना है।’’


उधर मैंने मिंकू से उसकी हैंड राइटिंग को देखकर कहा कि इसे देखकर लगता है कि तुम जब लिख रहे थे तो भूकंप आ रहा था। यह सुनकर आशुतोष अपनी हंसी नहीं रोक पाया।

0 comments