ये होनहार संघर्ष की नयी दास्तान के जनक बनकर उभरे हैं। इन्होंने अभावों में पलने वाले जीवन के मायने बदले हैं। वह कहते हैं न-‘इंसान चाहें तो कुछ भी कर सकता है, कुछ भी।’’ इन्होंने वही तो कर दिखाया है.
राजमिस्त्री का बेटा
आगरा में राजमिस्त्री का बेटा काशी आईआईटी में 202वीं रैंक के साथ गर्व से खड़ा होकर कह सकता है-‘‘हां, मैंने कर दिखाया।’’ यह असल में इतिहास रचने के बराबर है। गरीबी और तंगहाली से जूझता एक लाल आज सितारा बन कर उभरा है।
कोचिंग की बात तो दूर काशी साधारण पढ़ाई का खर्च भी वहन नहीं कर सकता था। लेकिन उसकी लगन और प्रतिभा ने उसके टीचरों को प्रभावित किया। उसकी सफलता की नींव उन्होंने ही तैयार की। उन्होंने उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उठाया।
काशी ने 12वीं की परीक्षा में 80 प्रतिशत अंक पाये। परिवार में दो भाई भी मजदूरी करते हैं। मूल रुप से पटना के रहने वाले काशी को वहां से उसके टीचर पैसा भेजते थे।
संघर्ष से मिली सफलता
जीवन में संघर्ष प्रारंभ से अंत तक चलता रहता है। जो उसका मुकाबला कर आगे बढ़ जाते हैं वे सफलता पाते हैं। शायद मेहनत का फल मीठा ही इसलिए होता है क्योंकि बाद में जो खुशी मिलती है, उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
आलोक के पिता का आज सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। वे मारे खुशी के फूले नहीं समा रहे हैं। भई, उनका बेटा जो आईआईटी में सफल हुआ है। पिता को उम्मीद है कि उनकी आर्थिक तंगी के दिन अब जल्द ही लद जायेंगे। वे मानते हैं कि आगे और अच्छा होगा। पिता खुशीराम इसपर बेहद खुश हैं।
आलोक ने जवाहर नवोदय विद्यालय ठाकुरद्वारा से पढ़ाई की है। उसकी रैंक है 1574।
हर किसी को ऐसा बेटा नसीब हो
अंकित सिंह ने आईआईटी में 766 वीं रैंक हासिल की। पेशे से दर्जी पिता की औलाद अंकित ने अपने पिता ही नहीं बल्कि क्षेत्र का नाम रौशन किया है। एक गरीब पिता की आंखें भर आर्इं। वह हर किसी से गले मिल रहा था। उसकी आंखें गीली थीं। आंसु खशी के थे। बंगला गांव में आज हर कोई कह रहा है-‘‘हर किसी को ऐसा बेटा नसीब हो।’’ भाई ने मिठाई बांटकर अपनी खुशी जाहिर की।-harminder singh


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