
मैं कभी स्वीमिंग पूल गया नहीं। मेरे कुछ साथी वहां अक्सर जाते हैं। Jubilant के पूल में तैरने का आनंद अपना है। अब किताबों के साथ पूल पर जाया जाये तो फनी लगेगा न।
मैंने बहुत पहले सोचा था कि जब पूल में जाया जायेगा तो पूरी तैयारी के साथ। वो भी किताबें लेकर। किसी ने पूछा-‘यह कुछ ज्यादा नहीं हो जायेगा।’
मेरा जबाव था-‘होने को तो पानी भी वहां डूबने लायक है।’
कई लोगों को वहां हैरानी करते पाया गया है। मतलब कूदने के अलग स्टाइल में। छपाक! और झपाक! दूसरे के कान, नाक बगैरह में पानी की सफल आपूर्ति। किसी के बारे में चर्चा हुई कि उन्होंने पूल का इतना स्पेस घेरा कि पानी का लेवल ही चंद इंच ज्यादा हो गया। इसलिए कुछ नौसिखिये डूबते-डूबते बचे या उनके कूदने से बनी लहरों में किनारे से जा टकराये।
मैं तो यही चाहता हूं कि एक कुर्सी और एक छाता लगाकर आराम से कोई शानदार Novel या जीवनी वहां बैठकर पढ़ूं। वैसे ऐसे भी हो सकता कि मैं वहां बैठकर किसी गणित की पुरानी किताब पर अपनी खुंदक निकालूं नाव बनाकर या हवाई जहाज बनाकर। ऐसा करना जितना बचपन में भाता था, आज शायद उससे कहीं अधिक Exciting लगता है।
मैं आ रहा हूं जुबिलेंट तेरे पूल में -नहाने नहीं, बहाने या उड़ाने (नाव या हवाई जहाज) अपनी पुरानी सहेज कर रखी गणित की किताब के पन्नों से।
-Harminder Singh
0 comments