मुझे लगता है पढ़ाई में सुस्ती का कोई मतलब नहीं रह जाता। आप स्टूडेंट हैं तो आपका मुख्य काम पढ़ाई करना है। निशाना हमेशा सोच समझकर और काफी मेहनत करने के बाद ही लगता है। किताबें बुरी नहीं हैं बल्कि वे हमें सिखा रही हैं। भविष्य की तैयारी हमें खुद करनी है। किसी दोस्त की दोस्ती से ज्यादा कीमती हैं किताबें। हां, अगर हमें भी भीड़ में शामिल होना है तो ढील देने को आप आजाद हैं। मगर एक बात ध्यान रखियेगा कि पतंग कटने के बाद ही शायद फिर हमारे हाथ लग पाती है। यही बात समय पर भी लागू होती है।
मैं मानता हूं कि पढ़ाई में अनुशासन हमेशा बना रहना चाहिए। हमें इसकी आदत पड़ जाने तक अनुशासन का पीछा नहीं छोड़ना चाहिए। फिर देखना सब कितना आसान हो जायेगा और आप अनुशासन को अपनी लाइफ में शामिल कर लेंगे।
हर बार की तरह शुभांगी या सुमित का उदाहरण मुझे देना होगा क्योंकि इनके ज्यादा करीब रहा हूं न इसलिए। दोनों अनुशासन में पूरी तरह ढल चुके या यों कहिये कि उनमें एक जस्बा पैदा हो चुका भविष्य के लिए। वे अपना रास्ता स्वयं तैयार कर रहे हैं। उनके माता-पिता सिर्फ उन्हें छाते ही तरह गर्मी और बरसात से बचा रहे हैं। ये दोनों बचपन से ही अनुशासन के साथ जिये हैं।
-Harminder Singh
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