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बुधवार, जुलाई 06, 2011

भिखारी
























वह
कौन धूप से बारिश से,
लड़ता टकराता जाता है,
नंगा है, तन पीड़ित दुर्बल,
गिरता चलता रुक जाता है।

रह कर राजमार्ग पर भी,
वह भूख प्यास से रोता है,
पेड़ों के नीचे सोता है,
आंसू से मुख धोता है।

क्या भूल गये हो इसको,
यह भी अपना भाई है,
इसने महलों के स्वप्न सजा,
पत्तों की कुटी बनाई है।

हो विवश हाथ फैलाता है,
दोषी तो दुनिया सारी है,
मानवता का अभिशाप बना,
बेबस निर्दोष भिखारी है।

-Prateek Tiwari


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