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सोमवार, जुलाई 25, 2011

स्कूल के शुरुआती दिन

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स्कूल में मेरा एडमीशन हो चुका था। मुझे याद नहीं कि जब मैं पहली बार स्कूल में दाखिल हुआ तो कैसा महसूस किया। इतना कह सकता हूं कि पहली बार जब बच्चा नई जगह जाता है, वह हैरान हो जाता है। उसे उत्सुकता होती है। समझ लीजिए मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा।

उस समय स्कूल की बिल्डिंग इतनी विशाल नहीं थी। मगर तब भी नन्हीं आंखों की नजर में बहुत बड़ा स्कूल था। टिन शेड में हम पढ़ते थे। क्लास रुम काफी जगह लिए थे। खुलकर बैठते थे, भीड़-भाड़ का सवाल ही नहीं था। खिड़कियों में सरिये लगे थे जबकि उनके फ़्रेम लकड़ी के बने थे। खिड़कियों को आसानी से बंद किया जा सकता था।

घंटा खत्म होने पर हम खिड़की के बाहर झांकते, अच्छा लगता। वैसे जब कुछ मीटर दूर बाउंड्री के करीब के रास्ते पर कोई बैलगाड़ी या अन्य वाहन गुजरता तो कइयों की निगाह खुद-ब-खुद वहां मुड़ जाती। अगर टीचर ऐसा करते हुए किसी को देख लेते, उसे एक या दो बार झिड़क कर छोड़ भी देते। यदि कोई अधिक ही ‘अनुशासन-प्रिय’ शिक्षक हुआ तो वह गाल का रंग बदलने में कामयाब हो जाता या हथेलियों को कमजोर मानकर बच्चों को रोने पर मजबूर कर देता। कुछ ने चाक के टुकड़े का निशाना भी बनाया। नब्बे प्रतिशत सही लगता। ऐसे शिक्षकों को किसी निशानेबाजी की प्रतियोगिता में हिस्सा लेनी की सलाह दी जानी चाहिए थी। शायद देश के लिए मैडल लाने की असफल कोशिश के भागीदारों में उनका नाम भी शामिल हो सकता था।

-Harminder Singh



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