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मंगलवार, जून 21, 2011

महंगाई और जन सामान्य

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भारत में महंगाई बढ़ती जाने का एक अन्य बड़ा कारण माना जाता है कि जनसंख्या की अगाध वृद्धि। इधर खाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, उधर खाद्य पदार्थों और सभी प्रकार की अनिवार्य वस्तुओं का उत्पादन अनुपात से कम होता ही जा रहा है। ऐसी असंतुलन स्थिति में महंगाई तो बढ़ेगी ही
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अर्थशास्त्री मानते हैं कि जब किसी देश में विकास का दौर चलता है तो फलस्वरुप महंगायी आया ही करती है। यह भी कहा गया है कि महंगाई का रुझान केवल भारत में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में दिखाई दे रहा है। इस प्रकार सौ तर्क और सौ बहाने बनाकर जन सामान्य को महंगाई की इस मार को सहते रहने को विवश और एक प्रकार की अनिवार्यता बताने का प्रयास किया जा रहा है।

वस्तुओं के मूल्यों की गति इतनी तेज है कि आज जब किसी वस्तु को पुन: खरीदने जाओ तो वस्तु का मूल्य पहले से अधिक हो चुका होता है।

इस बढ़ती हुई महंगाई को देखकर मन में यह प्रश्न कौंध उठता है कि आखिर इस निरंतर बढ़ती जा रही महंगाई के कारण क्या हैं?

भारत में महंगाई का महत्वपूर्ण कारण है -हर प्रकार का असंतुलन। इस असंतुलन का कारण है -तरह तरह के भ्रष्टाचार और काला बाजार।

भारत में अनेक कानून काम को जानबूझ कर लंबा करने की मानसिकता, अधकचरे नेताओं के जमघट, मंत्रियों का अंगूठा छाप होना इत्यादि हर प्रकार के असंतुलन को प्रकट करते हैं। इन सबने उनको भी भ्रष्ट कर दिया है जिनपर जनरक्षण का सीधा दायित्व था। फलस्वरुप खुले बाजार से तो आम उपभोक्ता के लिए माल गायब होने लगा, पर कालेबाजर में दुगुने दामों में इसकी बहुतायत रहने लगी जिससे कि महंगाई स्वाभाविक रुप से बढ़ी।

कई बार प्राकृतिक असंतुलन भी महंगाई वृद्धि का कारण बनता है तथा हमारे देश में तो अक्सर ऐसा होता है। कारण कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद तक भी भारत की कृषि पर आश्रित है और सारी अर्थ व्यवस्था का मूल आधार ही कृषि पर है।

भारत में महंगाई बढ़ती जाने का एक अन्य बड़ा कारण माना जाता है कि जनसंख्या की अगाध वृद्धि। इधर खाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, उधर खाद्य पदार्थों और सभी प्रकार की अनिवार्य वस्तुओं का उत्पादन अनुपात से कम होता ही जा रहा है। ऐसी असंतुलन स्थिति में महंगाई तो बढ़ेगी ही।

इस सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई को रोकना भी अति आवश्यक है। हर प्रकार का संतुलन ही हमें और हमारे भविष्य की कमरतोड़ मार से, जन सामान्य को बेमौत मरने से बचाया जा सकता है। जनसंख्या का संतुलन भी पहली आवश्यकता है, पर सबसे पहले एक राष्ट्रीय चरित्र एवं राष्ट्रीय अनुशासन किया जाना चाहिए।

अनाजों, आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाया जाए। वनों की रक्षा की जाए, ऊर्जा के नये स्रोत खोजे जा रहे हैं। धन संपत्ति आदि का समान विभाजन किया जाए।

इस तरह के सभी उपाय जन मानस को अपने प्रति पूर्णत: जागरुक बनाकर ही किया सकता है। इसके लिए आदि कुछ प्रतिबंध लगाने पड़ें तो झिझकना नहीं चाहिए। तभी महंगाई के भूतों को भगाया जा सकता है, अन्यथा नहीं।

-Ankita Singh

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