मुझे याद नहीं कि कब मैंने अपनी मोटी साइंस की किताबों को अलमारी में सजाया था। हालांकि उनकी मुझे अब कोई जरुरत नहीं है, क्योंकि स्कूल तो कब का बीत गया और कालिज भी। हां, कुछ बच्चे जो खूब पढ़ना चाहते हैं जब उन्हें किसी किताब या मदद की जरुरत होती है, मैं उपलब्ध कराता हूं।उस दिन सुमित के पिताजी 9वीं क्लास की बायो और कैमीस्टरी की किताबों की तलाश में आये। काफी ढूंढ़ने के बाद केवल एक किताब ही मिल सकी। सुमित आजकल अलीगढ़ में है। उसके साथ उसका पड़ोसी बंटी भी है। दोनों परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
मैंने कमरे का कोना-कोना छान मारा, मगर मुझे किताब के दर्शन नहीं हुए। इसी बहाने मेरी एक खोई पुस्तक मिल गयी। मैं इसपर भगवान का शुक्रिया किया।
आजकल वैसे भी मैं किताबों से दूर ही हूं। हां, कुछ उपन्यास पढ़ता रहता हूं, समय मिलने पर। लेकिन जब पढ़ता हूं तो करीब दो घंटा लगातार बैठा रहने के बाद भी समय का पता नहीं चलता।
मुझे किसी ने बताया था कि शुभांगी शाम को अपना होमवर्क खत्म करने के बाद कोई न कोई उपन्यास पढ़ती है और सोती करीब 11 बजे के बाद ही है। उसने ऐसी आदत काफी वक्त से बना रखी है।
-harminder singh
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