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रविवार, दिसंबर 01, 2013

खड़ूस टीचरों की जय!

 
अपने टीचरों के बारे में हमारे ख्याल बहुत ही अजब-गजब होते हैं। किसी ने कहा-‘यार वो कितना पागल है। अपनी गाता रहता है।’ कहीं से आवाज आयी -‘उसे अन्नू मलिक से मिलवा दो।’

खराब टीचरों की गलतियों की सजा मिलती है बेचारे बच्चों को। अंग्रेजी का टीचर सबसे बेकार। हिन्दी ढंग से आती नहीं, अंग्रेजी क्या खाक पढ़ायेगा। ग्रामर की तो बैंड बजा कर रख ही दी। साथ ही जो बच्चे थोड़ा बहुत अंग्रेजी जानते भी थे, उनसे वह भी छीन ले गया ‘कोयले का भुना आलू।’

क्या करें जब टाइम खराब होता है, तब बच्चों को टीचर भी बेकार मिलते हैं।

उस दिन जब एक लड़के की टांग में चोट लगी तो उसे एक महीना छुट्टी लेनी पड़ी। उसे एक महीने घर पर एक टयूशन मास्टर पढ़ाने आने लगा। मास्टर जी ना ढंग से अंग्रेजी जानते थे, गणित उनके लिए दूर की कौड़ी थी। जबकि साइंस से उनकी कभी पटती नहीं थी। माता-पिता को इतना समय नहीं था कि वे देख सकें कि बच्चा कर क्या रहा है?

प्रिंसिंपल की हालत सबसे बेकार हो सकती है। ऐसा कई बार देखने को मिला। उन्हें यह भी पता नहीं रहता कि स्कूल में हो क्या रहा है? कई लोग उन्हें अंधा या धृतराष्ट्र की उपाधि आराम से दे सकते हैं। कई स्कूल-कालेज ऐसे हैं जहां प्रिंसिपल किसी काम के नहीं, बस उन्हें कुर्सी मिली है और सारा काम कोई ओर लोग देख रहे हैं।

किसी ने कहा -‘खड़ूस टीचरों की जय!’

फिर एक अवाज आयी -‘जय का फायदा क्या, जब खड़ूस की उपाधि पहले ही दे दी।’

तभी एक तमाचे की गरज के साथ आंसू की बौछारें टपकीं।

रोता हुआ एक बच्चा क्लास से बाहर दौड़ा -‘बिना बात के तमाचा जड़ दिया मेरे।’

अब इसमें गलती पता नहीं किसकी थी, लेकिन इतना जरुर हुआ था कि पांच उंगलियों के निशान अभी तक उस गोरे बच्चे के चेहरे पर साफ नजर आ रहे थे।

अब बताईये वह टीचरों को खड़ूस न बोले तो क्या बोले? बाद में पता लगा कि वह लड़का क्लास में सो रहा था। लेकिन एक बात जो क्लीयर है -‘थप्पड़ जड़ने की जरुरत क्या थी?’


-harminder singh


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