डरने की जरुरत ही क्या है? और डर भी किस चीज का? छोड़ो, डर को मारो गोली। किताबें हमारी दोस्त हैं -सबसे अच्छी दोस्त। भला दोस्त से भी कोई डरता होगा।पता नहीं क्यों एक्साम के समय बच्चे पढ़ाई को हव्वा समझने लग जाते हैं और किताबों से भय खाने लग जाते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि किताबें हर किसी को डराती हैं। किताबें केवल उन्हें ही डराती हैं जो उनसे डरते हैं। एक्साम का डर भी उन्हीं के लिए है, बाकी को डर नहीं.
सबसे पहले बात करते हैं, किताबों से दोस्ती की। किताबें कितनी अच्छी हैं न, कितने सुन्दर अक्षर लिखे हैं, साथ में ढेरों चित्र भी। कितना ज्ञान सिमटा है कागज के पन्नों में। किस चीज की जानकारी इनमें नहीं, सबकुछ बसा है।
शोर नहीं करतीं, लेकिन कितना कुछ कह जाती हैं। ऐसी दोस्त जो हमारे कितने काम आती है, बदले में हमसे कुछ मांगती भी नहीं। सिर्फ इज्जत से संभाल कर रखिये और उन्हें प्रेमपूर्वक पढ़िये, जीवन में आनंद ही आनंद है।
मेरी बात मानिए अगर आपने किताबों से दोस्ती फिलहाल तक नहीं की है तो अब कर लीजिए, वे बुरा नहीं मानेंगी। न ही यह कहेंगी -‘‘मैं बात नहीं करती, तुमने बहुत देर कर दी।’’
यही तो कमाल है किताबों में उन्हें किसी की बुराई से मतलब नहीं, उनका काम संसार की भलाई करना है। तो प्यारे विद्यार्थियो हर विषय की किताब से नाक-मुंह मत सिकोड़ो, न उन्हें चिढ़ाने की कोशिश करो। उन्हें खोलो और पढ़ो, ज्ञान तुम्हारा इंतजार कर रहा है।
शुरु में थोड़ा अटपटा या बोरिंग लग सकता है, ‘बट टेक इट इज़ी’, आप फायदे में ही रहेंगे। विषय भी कई हैं और उनमें ढेर सारे चैप्टर। धीरे-धीरे पढ़ते जाओ और देखो कमाल। एक्साम से पहले की जो टेंशन लेकर बच्चे बैठे रहते हैं, उसका पता भी नहीं चलेगा। एक्साम टेंशन-फ़्री और रिजल्ट बेहतर।
-Harminder Singh
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