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शनिवार, अगस्त 13, 2011

चश्मिश कहीं की

चश्मे के बिना वह देख सकती है, मगर आंखें दुखती हैं। पढ़ते समय आंखों से पानी बहता है। लिख नहीं सकती। इसलिए चश्मे लगाकर सब नार्मल है।

प्रिया के हाल में ही निगाह के चश्मे लगे हैं। वह जैसी पहले थी, उतनी ही सुन्दर लग रही है। वैसे शुभी कुछ ज्यादा ही क्यूट लगती है, जब चश्मे लगाकर वह पैंसिल चलाती है। उसकी सीरीयसनेस बाहर आ जाती है।

खैर, प्रिया अब भी वही पढ़ाई की टेंशन से नहीं निकल पा रही। मानो एक अनचाहे दबाव में जी रही हो। उसकी परेशानी कुछ-कुछ मानसी की तरह लगती है, मगर मानसी तो दसवीं पास कर चुकी जबकि प्रिया चौथी में है।

मानसी का चश्मा उसके पढ़ने के तरीके कारण लगा था। प्रिया के साथ भी वही कंडीशन है। जबकि शुभांगी के सातवीं क्लास में यानि यही कोई तीन साढ़े-तीन साल पहले चश्मा लगा था, पर वह कुछ ओर कारण था। फिर जल्दी हट भी गया।

प्रिया को किसी ने चिढ़ाया नहीं, जबकि मानसी को ज्यादातर ने चिढ़ाया था : चश्मिश कहीं की।

Yours

Harminder



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