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शुक्रवार, जुलाई 08, 2011

शुभी ही शुभी

shubhi gajraula




















मुझे कोई मिलता भी तो नहीं जिसके साथ मैं अपना खाली दिमाग खपा सकूं। इसलिए शुभी को कुछ न कुछ कहता रहता हूं। वह जब चिढ़ती है तो बहुत ही क्यूट लगती है। उसे हर कोई चिढ़ाना चाहेगा। अरे! एक बार कोशिश कीजिए। वैसे कई लोग यह सौ प्रतिशत कह सकते हैं विद सबूत कि ‘‘मैं मजाक ठीक-ठाक कर लेता हूं।’’

हंसने में और वह भी दूसरों पर, सबको मजा आता है। मैं भी एक बार नहीं, बल्कि बार-बार उसी लाइन में खुद को खड़ा पाता हूं। आप उसे यह मत समझिये कि मैं वहां ‘वेटिंग’ में होता हूं। सबसे आगे नहीं, फिर भी तीसरे-चौथे से कम नहीं होता।

बात शुभी की ही मैं हमेशा करने की कोशिश करता हूं। यों कहिये कि शुभी यहां भी टांग अड़ा देती है कहते हुए -‘‘नहीं, नहीं मैं आ गयी, अब नहीं हटूंगी।’’

जानता हूं वरना वह अपने ‘बाबा’ को बुला लायेगी।

सोच रहा हूं शुभी के नाम पर एक नया कोलम चालू कर दूं -‘Shubhi's Diary’.


yours

Harminder Singh





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