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रविवार, दिसंबर 01, 2013

बारिश में क्रिकेट खेलना कोई बुरा आइडिया नहीं है। मैं अपने मोहल्ले के बच्चों के साथ इतना क्रिकेट खेला कि आज पीछे मुड़ने पर खुद हैरान हो जाता हूं। पढ़ाई से एक तरह से समझौता ही हो गया था- नो पढ़ाई, केवल खेल। यह खुद को तसल्ली देने के बराबर था क्योंकि क्रिकेट का एक तरह से नशा हो चुका था। यह आदत इस कदर हावी थी कि पढ़ाई तक दांव पर लग चुकी थी।

माता-पिता को लगता कि अब स्थिति खराब हो चुकी है। लेकिन ऐसा था नहीं। इतनी समझ तो थी कि खेल बगैरह से कोई फायदा नहीं। फिर भी खेल सोच पर हावी ही था।

बारिश की परवाह हमने नहीं की, कभी नहीं। चिलचिलाती धूप का भी हमपर कोई असर नहीं हुआ। ठंड और कोहरे तो मानो कुछ थे ही नहीं। यह भी कभी नहीं सोचा उस समय कि आखिर हम किसी मिट्टी के बने हैं।

कपड़ों की धुलाई खुद करने की एक-आध बार सोची जरुर थी, लेकिन पड़ोस के चंगू-मंगू के उस असफल प्रयास से सब पर पानी फेर दिया जिसमें उन्होंने कपड़े स्वयं धोये थे। सुखाने के बाद कपड़े बुरी तरह छलनी थे क्योंकि उन्होंने इस तरह धोया था, पीट-पीटकर धोया था कि बेचारे कपड़े कहलाने लायक ही नहीं रह गये थे।

खैर, क्रिकेट तब तक चलता रहा जबतक दसवीं नहीं आयी। दसवीं में एंट्री क्या हुई, सब बदल गया। एक सोच विकसित हो गयी और महसूस हुआ कि खेल के पार भी कुछ है।


-harminder singh

शुक्रवार, जुलाई 05, 2013

स्कूल तो खुल गये। अब वही कहानी दोहरायी जायेगी तो सदियों से चली आ रही है। वो फिल्म का गाना है न -
‘‘कैसी ये कहानी,
 कुछ अनकही।’’

मिंकी परेशान नहीं है अब। मिंकू हैरान नहीं है अब। आरजू को लगता है कि पढ़ाई नहीं है फालतू की चीज। नन्हीं शुभी के लिए क्रेजीनैस का टाइम फिर शुरु हो चुका। आकाश फिर से दौड़ भाग में जुट गया। जाने कितने बच्चे दौड़ रहे हैं इधर से उधर। फिर कुछ फिल्मी हो जाये -
‘‘दौड़ा-दौड़ा....भागा-भागा सा...।’’

जिंदगी कहीं यूं ही न निकल जाये दौड़ते-भागते। उफ्! कितनी टेंशन है भाई।

क्या करें पढ़ना पढ़ता है।
बिना बात के अड़ना पड़ता है।
किताबों से लड़ना पड़ता है।

फिर बड़ा आदमी बनने का सपना कौन पूरा करेगा?
तेरा.....डैश।

ऐ..बाजू हट...चल कुछ नया बजा।
बोरीयत और नींद को मारनी पड़ती है गोली...वरना पढ़ाई-लिखाई में बज जायेगा बैण्ड।

फिर कुछ याद आ गया-
‘‘आ कहीं दूर चले जायें हम,
 न हो कोई गम....
 तारा रम पम...तारा रम पम।’’
-Harminder Singh

मंगलवार, जून 28, 2011

कई बच्चे हमेशा पढ़ाई से बचने के मूड में रहते हैं। अब प्रिया को ही ले लो। देखने में कितनी मेहनती लगती है, मगर जब पढ़ाई-लिखाई की बात आती है तो वह टेंशन के बादलों में कहीं खो जाती है। अब बरसात हो तब कहीं बादल छंटें भी, लेकिन ऐसा यहां मुश्किल होता है।

प्रिया में सभी गुण हैं जो उस उम्र की एक आदर्श लड़की में होने चाहिएं। बस किताबों से जी चुराती है। उसका रिजल्ट कार्ड देखिये आप मुझे बेवकूफ कहेंगे कि बेचारी बच्ची को खुलेआम ‘पढ़ाई का चोर’ साबित करने पर तुले हैं। 70 प्रतिशत औसत के नंबर उतने बुरे कहां? भई, मैं चाहता हूं कि अगर वह जी चुराना बीस प्रतिशत कम कर दे तो 80 परसेंट तक पहुंच जायेगी वह।

मैंने मुकुल की बात पहले की थी। वह तो किताब उठाकर देखता ही नहीं। वह प्रिया से कई कदम आगे है। पढ़ाई-लिखाई उसके लिए काले से भी काले मेघों का घेरा है। वह मुझे ‘तारे जमीन पर’ के नन्हें हीरो की तरह लगता है। अभी तक उसे आमिर खान जैसा कोई टीचर नहीं मिला।

मेरे विचार में छुट्टियां कम हों। छुट्टियां बच्चों को आलसी बनाती हैं।

-Harminder Singh